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| 2026-04-18 | 👁️ 183 |

संविधान निर्माता के प्रश्न पर एक विचार :

“सही जानकारी का प्रसार होना चाहिए” —
इसी उद्देश्य के साथ यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या भारतीय संविधान के निर्माण को केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित करना उचित है?

इतिहास के अनुसार, बाल गंगाधर तिलक ने 1895 में “स्वराज बिल” के माध्यम से भारत के लिए एक प्रारंभिक संवैधानिक ढांचा प्रस्तुत किया, जिसमें लगभग 113 अनुच्छेद बताए जाते हैं। यह भारत में संवैधानिक सोच की एक प्रारंभिक पहल मानी जाती है।

इसके बाद एम. एन. रॉय ने 1928 और 1944 में संवैधानिक विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जिसमें लगभग 13 अध्याय और 137 अनुच्छेदों का उल्लेख मिलता है।

फिर 1947 में बी. एन. राव ने संविधान का एक विस्तृत मसौदा तैयार किया, जिसमें लगभग 240 अनुच्छेद, 25 भाग और 13 अनुसूचियाँ शामिल थीं।
यह मसौदा आगे चलकर संविधान सभा के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बना।

स्वतंत्रता के बाद, संविधान सभा के तहत डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर और उनकी समिति के सदस्यों ने 1949 मे अंतिम मसौदा तैयार किया,
जिसमें 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ शामिल थीं।
* संविधान के मसौदे पर हस्ताक्षर के समय, डॉ. भीमराव आंबेडकर के हस्ताक्षर 29वें क्रम था।
* संविधान की सोच व निर्माण का कार्य आंबेडकर के जन्म से पहले ही शुरू हुई थी, तो संविधान निर्माता उन्हें कहना ठीक नहीं।


इस पूरी प्रक्रिया का नेतृत्व उस समय संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया।
* नेतृत्व: डॉ. प्रसाद ने संविधान के निर्माण में सद्भाव, धैर्य व दूरदर्शिता का परिचय दिया।
* अंतिम भाषण: 26 नवंबर 1949 को, संविधान को अपनाने के दिन, उन्होंने अध्यक्ष के रूप में समापन भाषण दिया था।
* भूमिका: उनके मार्गदर्शन में ही संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के लिए सर्वोच्च कानून तैयार किया।

यह भी उल्लेख किया जाता है कि महात्मा गांधी ने संविधान निर्माण समिति के लिए डॉ. आंबेडकर के नाम का समर्थन किया था, जिससे उन्हें इस महत्वपूर्ण कार्य में भूमिका निभाने का अवसर मिला।

हालाँकि, यह समझना आवश्यक है कि संविधान निर्माण एक सामूहिक, संस्थागत और चरणबद्ध प्रक्रिया थी। इसमें अनेक व्यक्तियों और विचारों का योगदान रहा है। इसलिए किसी एक व्यक्ति को “संविधान का एकमात्र निर्माता” कहना एक सीमित दृष्टिकोण हो सकता है।

1950 से लेकर आज (2026) तक भारतीय संविधान में 100 से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं, और वर्तमान में इसमें 448 अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियाँ हैं। ये संशोधन संसद द्वारा समय-समय पर किए गए हैं, जिनमें विभिन्न सरकारों और दलों की भूमिका रही है।

आज के संदर्भ में एक प्रश्न उठाया जा सकता है—यदि संशोधन और अद्यतन को ही आधार माना जाए, तो क्या वर्तमान पदाधिकारियों जैसे अर्जुन राम मेघवाल या देश के राष्टपति द्रौपदी मुर्मू को भी “संविधान निर्माता” की श्रेणी में रखा जाना चाहिए?
यह एक विचारणीय विषय है, जिसका उत्तर तथ्यों और संवैधानिक प्रक्रिया को समझते हुए ही दिया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:
भारतीय संविधान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास का परिणाम है। इसमें अनेक महान व्यक्तित्वों का योगदान रहा है और सभी को उचित सम्मान मिलना चाहिए।

मुख्य उद्देश्य:
“संविधान के निर्माण में योगदान देने वाले सभी व्यक्तियों के साथ न्याय हो।”

– विनय बिरादार ( जन नेता )

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